जीवन की सोदेश्यता
मानव जीवन ईश्वर की उत्क्रष्ट् रचना है! श्रष्टि की रचना से पूर्व एक अकेला ब्रह्म ही था उस परम चेतना मैं संकल्प हुआ "एकोहम् बहुश्यामि" अर्थात मैं एक हूँ अनेक हो जाऊँ! चूंकि वह परम चेतना निर्विकल्प है अशरीरी परमात्मा के संकल्प मात्र से शरीर धारी मनुष्य की रचना हुई जो ईश्वर का विकल्प तो नहीं था लेकिन मानव देह मैं परमात्मा अंशी का अंश रुप आत्मा समाविष्ट हुई जिससे स्थूल देह धारी मनुष्य अपने निज स्वरूप मैं शाश्वत ईश्वर का ही आत्मरूप अंश है! शरीर मैं ईश्वर रूप से वह अशरीरी व अविनाशी ही है! अतः मनुष्य शरीर मैं आत्म स्वरूप ईश्वर अंश देह से बिलकुल भिन्न है अर्थात वह शरीर नहीं है! यह तथ्य वेदानुसार निर्विवाद है! रामचरित मानस मैं स्पस्ट है कि "ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशी" इसमें कहीं कोई संदेह नहीं हम शरीर नहीं हैं अर्थात हम विशुद्ध आत्मा ही हैं यह अनेक प्रकार से स्वय सिद्ध है! ईश्वर रचना की सोदेश्यता यह नितांत गहन चिंतनीय एवम मंथन का विषय है कि उस परम तत्व, अगम्य परम सत्ता को श्रष्टि निर्माण, तदंतर मानव उत्पति के संकल्प की जागृति क्यों हुई! ईश्वर निराकार...